संविधान के अनुसार, भारत एक प्रधान, समाजवादी, धर्म-निरपेक्ष, लोकतांत्रिक राज्य है, जहां पर विधायिका जनता के द्वारा चुनी जाती है। अमेरिका की तरह, भारत में भी संयुक्त सरकार होती है, लेकिन भारत में केन्द्र सरकार राज्य सरकारों की तुलना में अधिक शक्तिशाली है, जो कि ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली पर आधारित है।


ओबीसी भाइयों और बहनों उंगली टेढ़ी करने पर सब कुछ घर देने आते हैं भीख मांगने पर कुछ नहीं मिलता

संपादक हेमराज विश्वकर्मा
HR Times News नरसिंहपुर  :-  बीते 75 सालों से देश में सभी प्रस्थापित पार्टियां उलट पलट कर सत्ता सुख भोग रही हैं, परंतु ओबीसी एवं दलितों की समस्याएं बढ़ती ही जा रही हैं। 
ओबीसी के वर्चस्व वाली जनता पार्टी की 1977 में एवं जनता दल की 1989 में अल्पकालीन सरकार आते ही ओबीसी- दलितों की समस्याओं का निराकरण होने लगा। अभी भी  अपनी समस्याओं का समाधान हो सकता है ।सिर्फ नीचे बताए अनुसार उंगली टेढ़ी करने की भूमिका पर डटे रहें। 

     2024 में होने वाले लोकसभा एवं विधानसभा चुनाव में वोट मांगने आने वाले विधायकी एवं सांसदी के उम्मीदवारों से ये सवाल जरूर करें ?

         अंग्रेज विदेशी थे फिर भी उन्होंने सभी जातियों की जनगणना शुरू की परंतु खुद को स्वदेशीय कहलाने वाली कांग्रेस की सरकार ने 1947 में सरकार बनते ही मंत्रिमंडल की पहली ही बैठक में ओबीसी जनगणना बंद करने का कानून बनाया और उसी कानून को आज तक अमल में लाया जा रहा है, अपने पूर्वजों द्वारा किए गए इस महापाप के लिए राहुल गाँधी लिखित माफी मांगेंगे क्या ? 

             डा. बाबा साहेब अंबेडकर द्वारा मंत्रिपद से त्यागपत्र देने और  रामास्वामी पेरियार द्वारा तमिलनाडु में किए गए आंदोलन के कारण कांग्रेस के नेहरू सरकार को ओबीसी के हित के लिए कालेलकर आयोग की नियुक्ति करनी पड़ी थी, किन्तु उसकी रिपोर्ट को लागू न करके कचरे के डिब्बे में डालकर ओबीसी वर्ग का नेहरू सरकार ने भारी अपमान किया था।उसके लिए 52% ओबीसी से राहुल गाँधी माफी मांगेंगे क्या? 

       परदादा (नेहरू) ने कालेलकर आयोग दफन किया एवं दादी (इंदिराजी) ने मंडल आयोग को दरकिनार किया और (पिता) राजीव गाँधी ने 1990 में मंडल आयोग के विरोध में लोकसभा में  घंटे भर का भाषण किया, अपने बाप दादाओं द्वारा किए गए पापों का प्रायश्चित राहुल गाँधी करेंगे क्या ? 

         2010 में कांग्रेस सरकार रहते हुए ओबीसी सांसदों ने संसद में तीव्र आंदोलन किया उनके आंदोलन के सामने कांग्रेस सरकार को झुकना पड़ा और 2011 की राष्ट्रीय जनगणना में ओबीसी जनगणना कराने का आश्वासन तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एवं गृहमंत्री प्रणव मुखर्जी ने पार्लियामेंट में दिया। 
परंतु जनगणना कराते समय मालूम पड़ा कि जनगणना कराने वाले फार्म में ओबीसी का कालम ही नहीं है ।         ओबीसी सांसदों को फिर से संसद में आंदोलन करना पड़ा और उनके आंदोलन के आगे कांग्रेस सरकार को फिर झुकना पड़ा। 

ओबीसी जनगणना एवं जाति आधारित जनगणना कराने के लिए कांग्रेस सरकार को 'SECC-2010'  नाम का कानून बनाना पड़ा । किन्तु कानून बनाते समय कांग्रेस सरकार ने एक बदमाशी कर दी, कि इस कानून के अनुसार हो रही ओबीसी जनगणना का आंकड़ा मांगने का किसी को अधिकार नहीं होगा । सुप्रिम कोर्ट, नियोजन आयोग यहां तक कि राष्ट्रपति को भी इस जनगणना के आंकड़े मांगने का अधिकार नहीं होगा । 

यदि नियोजन आयोग को ही ये आंकड़े मांगने का अधिकार नहीं होगा तो ओबीसी के हित के लिए कोई भी योजना केन्द्र व राज्य सरकार लागू कर ही नहीं सकतीं । इस जनगणना में भी ओबीसी का कालम नहीं था। 

ओबीसी के विरोध में किए गए ये सभी षड्यंत्र राहुल गाँधी के नेतृत्व में किए गए उसके लिए राहुल गाँधी क्या प्रायश्चित करेंगे ? 

उदाहरणार्थ है कि  महाराष्ट्र में महाविकास आघाडी सरकार में शामिल राष्ट्रवादी कांग्रेस और शिवसेना द्वारा किए गए महापापों को भी ध्यान में रखें और चुनाव में वोट मांगने के लिए आने पर उनके पापों को गिनाएं---

इंपेरिकल डेटा इकट्ठा करने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे एवं उपमुख्यमंत्री अजीत पवार ने निधि उपलब्ध नहीं कराई, जिसके कारण सरनेम के आधार पर ओबीसी की संख्या गिनी गई फलस्वरूप ओबीसी की लोकसंख्या 52% से 40% पर लाई गई जिसकी वजह से अनेक जिलों में ओबीसी का राजनीतिक आरक्षण शून्य हो गया और उसी प्रकार नौकर भर्तियों में भी ओबीसी की संख्या कम हो गई, उद्धव ठाकरे और अजीत पवार को नेता मानने वाले उम्मीदवारों से चुनाव में इन पापों पर सवाल भी किए । 
ओबीसी की संस्था 'महाज्योति' को पैसे देकर भी अधिकारियों को खर्च करने का अधिकार सीमित रखना, जिसके कारण करोड़ों रुपये ओबीसी के हित में खर्च न होकर वापस जाते हैं। यह षड्यंत्र किसी की भी सरकार आये सतत किए जाते रहे हैं । क्योंकि इन सभी पार्टियों के मालिक ब्राह्मण या बनिया, मराठा रहे हैं । 
एससी+एसटी+ओबीसी को उनकी लोकसंख्या के अनुपात में उनके हक हिस्सा नकारना अर्थात ओबीसी दलित आदिवासी का अपमान करना ही है ।इस अन्याय पर सभी प्रस्थापित पार्टियों से सवाल पूछा ही जाना चाहिए, सभी पार्टियों द्वारा निरंतर ओबीसी का अपमान करते रहने के बावजूद उनके उम्मीदवारों को वोट देना मतलब अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारना ही है ! अब यह बंद होना चाहिए । 

2024 के लोकसभा व विधानसभा चुनाव में वोट मांगने आने वाले भाजपा जो सत्तारूढ़ पर एवं गठबंधन (एनडीए) के एमपी, एमएलए के उम्मीदवारों से ये सवाल अवश्य करें ।

इंपेरिकल डेटा के बगैर स्थानीय निकाय (ग्रामपंचायत से लेकर महानगरपालिका, जिला परिषद) चुनाव कराने पर सुप्रिम कोर्ट द्वारा 2016 में पाबंदी लगाने के बावजूद तत्कालीन फडणवीस (भाजपा के) सरकार ने केंद्र सरकार से इंपेरिकल डेटा नहीं लाया और राज्य सरकारों ने भी सर्वे करके डेटा इकट्ठा नहीं किया जिसका परिणाम यह हुआ कि ओबीसी का राजनीतिक आरक्षण रद्द हो गया जिसके कारण 27 हजार 855 ग्रामपंचायत, 351 पंचायत समितियां, 236 नगरपरिषद, 124 महानगरपालिका, 34 जिला परिषद व 7 कटक मंडल इस तरह कुल 28 हजार  634 पंचायती राज संस्थाओं में कम से कम एक लाख ओबीसी उम्मीदवारों को चुनाव में खड़े होने का अवसर ही नहीं मिला। 
           इन सभी में ओबीसी वर्ग का इतना बड़ा राजनैतिक नुकसान हुआ इसके लिए सिर्फ और सिर्फ तत्कालीन मुख्यमंत्री फडणवीस ही जिम्मेदार हैं यह सवाल आने वाले लोकसभा व विधानसभा चुनाव में भाजपा के उम्मीदवारों से जरूर पूछा जाना चाहिए। 

2014 से केन्द्र में भाजपा की सत्ता है इस दरम्यान ओबीसी, दलित व आदिवासी के हिस्से की निधि में केन्द्रीय बजट में लगातार कमी होती जा रही है, जिसके कारण इन पिछड़े वर्गों के विकास की योजनाएं ठप्प पड़ गई हैं सिर्फ EWS के माध्यम से ब्राह्मण- बनिया जातियों को भरपूर लाभ दिया जा रहा है, यह सवाल भाजपा के उम्मीदवारों से पूछा जाना चाहिए। 2014 से प्रशासन के सर्वोच्च पदों पर लेटरल इंट्री द्वारा भर्ती करके ओबीसी , दलित व आदिवासी के आरक्षण को खत्म कर दिया गया, पिछड़ी जातियों के हक की नौकरियों को हड़प करके वहाँ ब्राह्मण उम्मीदवार भरे जा रहे हैं इस पर भी वोट मांगने आने वाले भाजपा उम्मीदवारों से सवाल पूछे जाने चाहिए। 

मणिपुर में भाजपा की तरफ से सरकार के सहयोग से हिंसक दंगे करवाकर आदिवासियों की हत्याएं कराई जा रही हैं। आदिवासी महिलाओं पर घृणात्मक अत्याचार किए जा रहे हैं और इसी प्रकार देश भर में दलित, आदिवासी व ओबीसी जातियों में झगड़े लगाकर दंगे करवाने के षड्यंत्र किए जा रहे हैं इस पर चुनाव में भाजपा और उसके मित्रपक्ष के उम्मीदवारों से सवाल जरूर पूछे जाने चाहिए। 

देश के बड़े बड़े राष्ट्रीय उद्योग अडानी -अम्बानी जैसे ब्राह्मण बनिया उद्योगपतियों को औनेपौने दाम पर बेचे जा रहे हैं, निजीकरण करके आरक्षण खत्म करने के साथ ही देश को भिखारी बनाने का काम किया जा रहा है। इस पर भी आने वाले चुनाव में भाजपा के उम्मीदवारों सवाल पूछे जाने चाहिए। 

कांग्रेस, भाजपा, राष्ट्रवादी कांग्रेस, शिवसेना, मनसे जैसी करीब करीब सभी पार्टियों के मालिक ब्राह्मण या सामंतवादी ही हैं जिसके कारण वे आपस में दिखावे के लिए झूठमूठ की लड़ाई लड़ते हैं किंतु अंदर से एक दूसरे का साथ देते हैं और उलट पलट कर सत्ता में आते रहते हैं। ऐसी परिस्थिति में ओबीसी, दलित व आदिवासियों को अपना खुद का राजनीतिक विकल्प खड़ा करना चाहिए।  प्रमाणिक ओबीसी कार्यकर्ताओं ने ओबीसी राजनैतिक मोर्चा की स्थापना करके उपरोक्त पांचों पार्टियों के विरोध में चुनाव लड़ने का फैसला किया है। प्रमाणिक दलित, आदिवासी व अल्पसंख्यक कार्यकर्ताओं ने अपना अपना राजनैतिक मोर्चा स्थापित करके संयुक्त रूप से चुनाव लड़ा तो ये पांचों पार्टियां नेस्तनाबूद हो जायेंगी और सही अर्थों में फुले, साहू, अंबेडकर पेरियार के विचारों का राज स्थापित होगा  ।

संविधान के अनुसार, भारत एक प्रधान, समाजवादी, धर्म-निरपेक्ष, लोकतांत्रिक राज्य है, जहां पर विधायिका जनता के द्वारा चुनी जाती है। अमेरिका की तरह, भारत में भी संयुक्त सरकार होती है, लेकिन भारत में केन्द्र सरकार राज्य सरकारों की तुलना में अधिक शक्तिशाली है, जो कि ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली पर आधारित है।

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